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CG : विशेष लेख : कमार बस्ती के दिन अब बहुरने लगे

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महासमुंद सदियों से घने जंगल और बस्ती से दूर रहने वाले कमार जनजाति समुदाय के दिन अब बहुरने वाले हैं। आदिकाल से कमार जनजाति जंगली कंदमूल, वनों पर आश्रित होकर, जंगलों के बीच ही अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं थे। उन्हें विकास की किसी तरह की उम्मीद नहीं थी लेकिन अब उनके दिन फिरने वाले हैं। अब वे भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री जन मन योजना अंतर्गत हर कमार और विशेष पिछड़ी जनजाति बसाहटों में उनकी मूलभूत सुविधाओं के लिए विशेष पहल की गई है। जिसमें आवास, स्वच्छ पेयजल, बसाहटो तक जाने के लिए पक्की सड़कें, विद्युत, शौचालय, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित की जा रही है।

जिले के महासमुंद विकासखंड अंतर्गत ग्राम झालखमरिया एक ऐसे ही गांव है जहां कमार समुदाय सैकड़ो वर्ष तक मुख्य बस्ती से अलग रहते हुए एक विशेष टोला में निवास कर रही है। यहां 16 कमार परिवार रहते हैं जिनमें 55 सदस्य हैं। जबकि गांव की कुल जनसंख्या 2152 है। इन परिवारों के पास कुछ वर्ष पहले तक ना तो उनके पास पक्का आवास था और न शुद्ध पेयजल की उपलब्धता थी। खद्दर और घास फूस से बने झोपड़ी में रहकर अपनी जिंदगी बसर करने वाले राम सिंह कमार ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कारण आज यह पक्का छत नसीब हुआ है, नहीं तो यह केवल हमारा सपना ही था। आज हम एक पक्के और सुंदर घर में खुशहाली पूर्वक जीवन बिता रहे हैं।राम सिंह के अलावा यहां की मनीषा बाई कमार, फुलेश्वरी कमार बताती है कि एक समय हम झरिया का पानी पीने के लिए मजबूर थे। पास में ही तालाब है जहां हम गढ्ढा खोदकर पानी रिसने का इंतजार करते थे,सुबह और शाम बूंद बूंद पानी के लिए तरसते थे। आज हमारे घर में नल है हमें शुद्ध पानी पीने को मिल रहा है। वही लक्ष्मी कमार बताती है कि हम लोग सुबह से उठकर जंगल जाते थे लकड़ी लाने के लिए और वहीं से कुछ तेंदू, चार व कंदमूल लाकर बमुश्किल से अपना जीवन यापन करते थे। लेकिन आज हम सभी परिवारों के पास उज्जवला गैस अंतर्गत गैस मिला हुआ है। अब हम लकड़ी पर आश्रित ना होकर गैस में खाना बना रहे हैं। समूह से जुड़कर अब काम भी करने लगे हैं।मनरेगा से काम भी मिलता है।

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