Site icon

राजनांदगांव : लोक आस्था और विश्वास का पावन पर्व छठ

unnamed

राजनांदगांव I प्रकृति पूजा की सुदीर्घ परम्परा भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही चली आ रही है. अग्नि, वायु, वरुण, सूर्य और संध्या की अर्चना-वंदना आज भी हिन्दू धर्म में प्रचलित है. पर समय के प्रवाह में भक्ति निवेदन की प्रचलित परिपाटी में बदलाव आया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता. प्रकृति पूजा की इस प्राचीन परम्परा में भगवान भास्कर की जो पूजा है, उसकी आज भी महत्ता बनी हुई है.

छठ पूजा की पौराणिक कथा : मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जब ब्रह्माजी ने दुनिया का निर्माण शुरू किया तो सबसे पहले उन्होंने स्वयं को दो भागों -पुरुष और प्रकृति में विभक्त किया . उसके बाद प्रकृति ने अपने आप को छह भागों में विभक्त किया. प्रकृति के छठवें भाग को छठी कहा गया है. प्रकृति के इस भाग को माता रूप  में  स्वीकारने के कारण लोकभाषा में इसे छठी माता कहा गया है . ब्रह्म पुराण के अनुसार छठी माता को देवसेना के नाम से भी जाना जाता है. ये ऋषि कश्यप और अदिति की मानसपुत्री मानी गयी हैं. ये भगवान सूर्य की बहन और कार्तिकेय की पत्नी हैं.

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जाने वाले सूर्य-पर्व (छठ) की ऐतिहासिकता बिहार राज्य की मिट्टी से इस प्रकार जुडी है कि इसे यहाँ की संस्कृति से अलग कर के नहीं रखा जा सकता. वास्तव में यह आस्था और विश्वास का महान पर्व है. प्रचलित मान्यता के अनुसार वर्त्तमान झारखण्ड राज्य के पलामू जिले के देव नामक स्थान पर स्थित भगवान सूर्यदेव  का मंदिर स्वयं विश्वकर्मा द्वारा एक ही रात में तैयार किया गया था. यहां जाकर छठ मानाने का विशेष महत्त्व है.

 सूर्य पूजन का यह महान पर्व साल में दो बार चैत और कार्तिक मास में  मनाया जाता है, जिसमे स्त्री-पुरुष देव मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करने के लिए देश के विभिन्न भागों से यहां आते हैं. लोगों का विश्वास है कि छठ  व्रत करने से कुष्ठ रोग नहीं होता है अथवा यदि कोई ऐसा रोगी है तो वह सूर्योपासना से शीघ्र ही ठीक भी हो जाता है. इसके अलावा संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत किया जाता है. इतना ही नहीं, घर-परिवार और अपने सभी शुभचिंतकों की कुशल-कामना के लिए भी यह व्रत किया जाता है. इस व्रत में तीन दिन तक के उपवास का विधान है. साथ ही कार्तिक की ठंढी रात में उदरस्थ जल में खड़ा होकर अपनी भक्ति दर्शायी जाती है.

 प्रचलित प्रथा के अनुसार चतुर्थी को व्रती लोग इस पूजा की शुरुआत करते हैं. एक तरह से यह दिन व्रत धारणा का दिन होता है, जिसे लोक भाषा में “नहाय-खाय’ का दिन कहा जाता है. इस दिन, दिनभर निर्जला रहने के बाद रात में लौकी की सब्जी, चने की दाल, चावल या रोटी खाने का विधान है. पंचमी के उपवासी दिन को ‘खरना’ कहा जाता है. इस दिन भी निर्जला रहने के बाद रात में गुड़ से बनी खीर और सादी रोटी खाई जाती है. इस दिन नमक खाने का निषेध है. इसके बाद अगले लगभग छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास होता है. षष्ठी के दिन शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है. वास्तव में छठ का अर्घ्य उदरस्थ जल में खड़ा होकर ही देने का विधान है. इसके लिए जलाशयों में जाना अनिवार्य हो जाता है. छठ का अंतिम अर्घ्य सप्तमी की सुबह बाल सूर्य को देकर उपवास तोड़ा जाता है.

इस लोग पर्व की वैज्ञानिकता भी प्रमाणित है. सूर्य ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है. जीवों की उत्पत्ति में सूर्य रश्मियों का बहुत महत्त्व है. आयुर्वेद के अनुसार उदरस्थ जल में खड़ा होने से पेट की बीमारियां दूर हो जाती हैं. इस व्रत के बहाने जलाशयों की साफ-सफाई और जल संरक्षण की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है. प्रातःकालीन स्नान और जल समाधि की क्रिया से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है. अर्घ्य में कच्चे मौसमी फलों को अर्पित करने के विधान में वनस्पति संरक्षण का सूत्र शामिल है.

सबसे बड़ी बात यह है कि इस व्रत में पहले अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा होती है. इस विधान में जीवन का दर्शन शामिल है. अर्थात जो डूबता है वही उदित होता है

‘जिन ढूंढा तीन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ l

जो बौरा डुबन डरा, रहा किनारे बैठ ll 

यही सृष्टि का शाश्वत विधान है.  भगवान भास्कर आपकी मनोकामनाएं पूर्ण करे!

(शंकर मुनि राय)

Exit mobile version