Site icon

CG : शिब्बोथान मंदिर की मिट्टी से विदेश में बैठा व्यक्ति भी सांप के जहर हो जाता है मुक्त

99

जवाली। कांगड़ा जिला के अधीन भरमाड़ में स्थित सिद्धपीठ शिब्बोथान मंदिर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। देवभूमि हिमाचल की इस पावन स्थली भरमाड़ को सिद्ध संप्रदाय गद्दी, सिद्ध बाबा शिब्बोथान और सर्वव्याधि विनाशक के रूप में भी जाना जाता है। इस मंदिर के संदर्भ में कई दंतकथाएं प्रचलित हैं और कई इतिहासकारों ने भी इसकी विशेष मान्यता को लेकर अपने विचार प्रकट किए हैं। मंदिर में हर वर्ष सावन-भादों माह में मेले लगते हैं तथा इस दौरान दूरदराज से श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं।मंदिर का भगारा यानी मिट्टी व जलामृत पीने से ही जहर विकारों से मुक्ति मिल जाती है। अब 20 जुलाई से शिब्बोथान मंदिर में मेलों का आगाज होगा।

महंत राम प्रकाश वत्स के अनुसार, धार्मिक स्थल बाबा शिब्बोथान के गर्भ गृह में मछंदर नाथ, गोरखनाथ, क्यालू बाबा, अजियापाल, गूगा जाहरवीर मंडलिक, माता बाछला, नाहर सिंह, काम धेनु बहन गोगड़ी, बाबा शिब्बोधान, बाबा भागसूनाग, शिविंलग, 10 पिंडियां और बाबा जी के 12वीं शताब्दी के लोहे के 31 संगल मौजूद हैं। इन संगलों की 101 लड़िया हैं। जब बाबा शिब्बोथान को जाहरवीर जी ने वरदान दिए और वह अपने स्थान पर वापस जाने लगे तो अपने अंश को संगलों (शंगल) के रूप में रखकर वह अपनी मंडली सहित यहां विराजमान हो गए। ये संगल केवल गुग्गा नवमी को ही निकालकर बाबा शिब्बोथान के थड़े पर रखे जाते हैं। इन संगलों को छड़ी भी कहा जाता है। नवमी के दिन पुन: इन्हें अगली गुग्गा नवमी तक लकड़ी की पेटी में रख दिया जाता है।

Exit mobile version