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CG : अध्यक्षीय दीर्घा मुस्कुराई …

CG : अध्यक्षीय दीर्घा मुस्कुराई …

CG : अध्यक्षीय दीर्घा मुस्कुराई …

अंतत: इंद्र देवता मेहरबान हुए तो प्रदेशभर में झमाझम बारिश जारी है। खेत, इंसान और बांध तीनों मुस्कुरा रहे हैं। मानसून का असर छत्तीसगढ़ विधानसभा के सत्र में भी दिखा जहां अंतिम दिन रात ढाई बजे तक हाई यील्डिंग यानि भाषणों की भारी फसल लहलहाती रही। पांच दिन के मानसून सत्र की प्रमुख उपलब्धियां धर्मांतरण बिल पर मुहर, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अधिनियम-2026, नक्सलवाद पर चर्चा, विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव का धराशायी होना तथा वृक्षारोपण कर प्रकृति संरक्षण का संदेश देना इत्यादि रहीं। जाहिर है यह विधानसभा अध्यक्ष डॉ.रमन सिंह के ‘फलोर-atter मेनेजमेंट’ का कमाल है।

छत्तीसगढ़ के लोकतंत्र का मंदिर हमारी विधानसभा है जिसके अध्यक्ष हैं डॉ.रमन सिंह। जैसे स्कूल में एक प्रिंसिपल होता है, मंदिर में पुजारी और परिवार में पिता, वैसे ही विधानसभा का अध्यक्ष। चारों पदवियां देहात्मबुदिध की प्रतीक हैं। सदन की अध्यक्षता करते वक्त डॉ. रमनसिंह ने अपने साथ एक चैतन्यस्वरूप अलार्मिंग घण्टी हमेशा रखी जिसकी बदौलत वे संसदीय परंपराओं का पालन, विधायकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा तथा पक्ष—विपक्ष में सामंजस्य बनाए रखने में सफल रहे।

जब बहुमत चालाकी करता है तो वह अल्पमत को और भी ज्यादा चालाकी करने का निमंत्रण देता है। नक्सलवाद पर चर्चा का बॉयकाट कर अपनी फजीहत करने वाली कांग्रेस, साय सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई तो विधानसभा अध्यक्ष ने उसे तत्काल स्वीकार कर लिया। इसके बाद सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने प्रश्नों के सलीब खड़े करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जमकर आईना दिखाया। ऐसा लगा मानो कांग्रेस अपने ही चक्रव्यूह में फंस गई हो। अविश्वास प्रस्ताव नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने रखा जबकि समापन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किया। दोनों नेताओं ने लगभग ढाई घण्टे तक अपना वक्तव्य रखा। इसके बाद तो मानो हर वक्ता इसी लीक पर चल पड़ा। इस बीच रमनसिंह विधायकों से आग्रह करते रहे कि अभी 20 से ज्यादा वक्ताओं को बोलना है। अगर प्रत्येक ने समय का पालन नही किया तो सुबह 10 बजे तक सत्र चलेगा। मैं तो तैयार होकर आया हूं बाकी आपकी कृपा होगी तो सत्र जल्दी खत्म हो जायेगा।’

कबीराना दर्शन कहता है कि जो आप दूसरों से चाहते हैं, पहले खुद करके दिखाइए। कांग्रेस की ओर से विधायक सर्वश्री भूपेश बघेल, रामकुमार यादव, देवेन्द्र यादव, संगीता सिन्हा, उमेश पटेल, कवासी लखमा इत्यादि ने मुखर होकर सरकार को जमकर घेरा। वहीं सरकार की ओर विधायक सर्वश्री ओ पी चौधरी, रामविचार नेताम, अजय चंद्राकर, सुशांत शुक्ला, भावना बोहरा, राजेश मूणत, धरम लाल कौशिक ने विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब दिया लेकिन समय के वश में कोई ना रहा। बहस की गर्मी में यह भी देखते चलें कि सदन का समापन भाषण विधानसभा अध्यक्ष को देना होता है जिसके लिए कोई समय निर्धारित नही है मगर रमन सिंह ने यहीं पर आदर्श पगडण्डी दिखाई। उन्होंने मात्र तीन मिनट में अपना वक्तव्य खत्म कर सदन को भौंचक्क कर दिया। यह सभी 90 विधायकों को सबक था कि समय सीमा के अंदर अपनी बात कैसे कही जा सकती है! उलट-बिलौनियां यह कि सदन में एक मिनट की कार्यवाही में लाखों रूपये खर्च हो जाते हैं इसलिए समय और संसाधन दोनों बचाने का संदेश जरूरी था।

दरअसल पूरे समर्पण, पूरी एकाग्रता और दृढ़ निश्चय के साथ खुद को खरा साबित करने की अदम्य इच्छा और अदभुत क्षमता, रमन सिंह को जमाने और राजनीति के क्षेत्र में सबसे अलग करती है। विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर संविधान ने डॉ. रमनसिंह को जो शक्तियां उन्हें प्रदान की हैं, उसी के दम पर वे सदन चलाते हैं। सदन को कैसे चलाना है, यह तो वे ही तय करेंगे अत: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के भाषण के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रोका—टोकी करनी चाही तो रमन सिंह ने उन्हें संसदीय नियम समझा दिए। आसंदी पर विराजमान रमनसिंह ने बघेल को समझाईश दी कि ‘मुख्यमंत्री तुलनात्मक आकड़े प्रस्तुत कर रहे हैं, जो गलत नही हैं। सभी को अपना पक्ष रखने का अधिकार है।’ हरियाली के संविधान में हर फूल पौधे और फसल को आजादी है कि वह उन्मुक्त उगे। सियासत में कुछ भी बेमकसद नहीं होता। यहां उपस्थिति, अनुपस्थिति, मौन हो या मुखरता, सबकी अपनी अहमियत होती है। एक जागृत लोकतंत्र में सवाल उठने लाजिमी हैं। कभी-कभी कुछ आरोप भी लग सकते हैं। कुछ गलतफहमियां भी पैदा हो सकती हैं, पर बदनीयती न हो तो उन पर आसानी से पार पाया जा सकता है। नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत ने तो पहले ही सत्र में साफ कर दिया था कि रमनसिंह और मेरे रिश्ते कुछ अलग तरह के हैं। पांच दिन के सत्र में दोनों माननीयों ने अपनी सीमाओं—सम्मान का बखूबी ध्यान रखा। विधायक अजय चंद्राकर के तेवर से विपक्षी नेता खूब आगबबूला हुए मगर रमनसिंह ने न्यायपरक संवाद करके मना लिया। और विपक्ष ही क्यों, सत्ता पक्ष के विधायक जब भी उच्छृंखल हुए, रमन सिंह ने हिदायत रूपी चाबुक चलाया। सदन में लगभग 45 घण्टे चर्चा चली, एक दूसरे पर कटाक्ष भी हुए मगर शब्द ‘विलोपित’ कम ही हुए। चंद्राकर का कांग्रेस पर कटाक्ष : तीन राज्यसभा सासंद की आउटसोर्सिंग किसने की! चंद्राकर ने ही महंत से पूछा : छुरी से किसको मारोगे, महंत का जवाब ‘जिसको आप कहेंगे’ महंत ने नाराजगी जताई कि विधानसभा का पत्थर हमने सोनियाजी से रखवाया, मगर उदघाटन आपने मोदी से करा लिया। महंत का सवाल था कि नक्सलवाद पर हमारे नेता शहीद हुए, उन्हें याद क्यों नही किया। महंत की ही एक बात से सदन भौंचक्क रह गया कि स्व.रामचंद्र सिंहदेव ने हेमामालिनी के लिए 90 हजार की साड़ी हाथों से बनवाकर दी थी। समय को देखते हुए मन की बात कह देना रमनसिंह बखूबी जानते हैं। प्रत्येक वर्ष की भांति विधानसभा में सम्मान समारोह आयोजित हुआ तो वरिष्ठ विधायक धरम लाल कौशिक को ‘उत्कृष्ट विधायक’ का सम्मान हासिल हुआ। अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉक्टर साहब ने मन की बात कह दी। उन्होंने कौशिक की ओर मुखातिब होते हुए कहा कि ‘आपके लिए अब एक ही पद मुख्यमंत्री बचा है, इस पर सभा ठहाकों से गूंज उठी। अटलजी ने संसद में सही कहा था : न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितो यश: अर्थात मैं मृत्यु से नहीं डरता, डरता हूं तो बदनामी से, लोकापवाद से डरता हूं। रमन सिंह भी इसी पगडण्डी पर चल रहे हैं। कतील शिफाई का उम्दा शेर याद आ गया : अपने होठों पर सजाना चाहता हूं, आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं।

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