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राजनांदगांव : तीजनबाई की लोक साधना को किया नमन कविता और चिंतन से सजी साहित्यिक संध्या…

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राजनांदगांव ,साकेत साहित्य परिषद की ग्राम सुरगी में मासिक साहित्यिक परिचर्चा, कवि गोष्ठी और 27वें वार्षिक सम्मान समारोह की तैयारी बैठक आयोजित की गई। यह बैठक साहित्य, संस्कृति और लोक परंपरा के संरक्षण के संकल्प के साथ संपन्न हुई। कार्यक्रम में पद्मविभूषण स्व. तीजनबाई, लोक कलाकार स्व. रामू यादव, शिक्षाविद स्व. राजेन्द्र सिंह ठाकुर को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कलाकारों की मौजूदगी रही।

साकेत भवन, सुरगी में आयोजित कार्यक्रम के प्रथम सत्र को छत्तीसगढ़ की महान लोक विभूतियों की स्मृति को समर्पित किया गया। साहित्यकारों और कलाकारों ने स्व. तीजनबाई, स्व. रामू यादव एवं स्व. राजेन्द्र सिंह ठाकुर के कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए योगदान को याद करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए।

मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार एवं छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के जिला समन्वयक आत्माराम कोशा ने कहा स्व. तीजनबाई ने पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाई है। हास्य कवि वीरेंद्र तिवारी और पवन यादव के संचालन में आयोजित कवि गोष्ठी में प्यारेलाल देशमुख, दिलीप साहू, आनंद सार्वा, जसवंत मंडावी, कैलाश साहू, डोहर दास साहू, कुलेश्वर दास साहू, अमृत दास साहू, देवजोशी, माला गौतम, पप्पू कलिहारी, चंचल साहू, आकाश साहू, राजेन्द्र देवांगन आदि मौजूद थे।

लोक परंपरा, संस्कृति भाषा के संरक्षण का आव्हान आत्माराम कोशा ने कहा कि पद्मविभूषण स्व. तीजनबाई ने यह सिद्ध किया कि लोककला किसी क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सांस्कृतिक धरोहर होती है। अध्यक्ष ओमप्रकाश साहू ने नई पीढ़ी से अपनी भाषा, संस्कृति साथ ही लोक परंपराओं के संरक्षण के लिए आगे आने का आह्वान किया। तीनों के कला, संस्कृति और शिक्षा जगत में योगदान को साहित्यकारों ने प्रेरणादायी बताते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

जीवन संघर्ष, साधना में समर्पण का उदाहरण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता कुबेर सिंह साहू ने कहा कि तीजनबाई का जीवन संघर्ष, साधना और लोकसंस्कृति के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने लोककलाओं के संरक्षण को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि नई पीढ़ी को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। विशिष्ट वक्ता महेन्द्र कुमार बघेल ने कहा कि तीजनबाई की प्रभावशाली प्रस्तुति शैली ने पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

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