डोंगरगांव , शांतिनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर की धर्मसभा में नियमित प्रवचन के दौरान साध्वी आज्ञांजना जी मसा ने सोमवार को कहा कि मिथ्यात्व के घेरे में रहने के कारण व्यक्ति को अच्छे-बुरे का सही अनुभव नहीं हो पाता। सम्यक दर्शन जीवन का अनमोल हीरा है, जो व्यक्ति को भटकने नहीं देता और मोक्ष के मार्ग तक पहुंचाता है।
सम्यक दर्शन रूपी मार्ग को अपनाने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। कर्मों का बंध बार-बार होता रहता है। कर्मों के क्षय की दिशा में पुरुषार्थ करना ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। जीवन में सम्यक भाव जागृत होने के बाद कर्मबंध की तीव्रता कम होती है और कषायों पर भी नियंत्रण आने लगता है। मसा ने राजा श्रेणिक का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक बार राजा ने गर्भवती हिरणी का शिकार कर दिया। उसके गर्भ में दो बच्चे थे। हिंसा के बाद भी राजा को पश्चाताप नहीं हुआ, बल्कि वह अपने निशाने पर गर्व करने लगा। हिरणी को तड़पाकर मारने और उस हिंसा पर गर्व करने के कारण उसके नर्क आयुष्य कर्म का बंध हुआ। किसी भी जीव के प्रति हिंसा के भाव से बचना चाहिए।
कहा कि भारत विभिन्न धर्मों और संत परंपराओं वाला देश है। साधु-साध्वियों के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखना चाहिए। मार्ग में साधु-साध्वी दिखाई दें तो वाहन रोककर कुछ क्षण ठहरें, वंदन करें और आगे बढ़ें। श्रद्धा मजबूत होगी तो परमात्मा से निकटता भी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि गुरु भगवंतों ने समझाया है कि जिस बात को उजागर करने से व्यापक नुकसान की आशंका हो, उसे अपने तक सीमित रखना ही उचित है। धर्मसम्मत तरीके से अपनी बात रखने की कला सीखना जरूरी है। कई बार शब्दों या रहस्य उजागर करने में की गई छोटी-सी लापरवाही जीवनभर की पीड़ा का कारण बन सकती है। कहा कि जीवन में संयम केवल आहार और व्यवहार में ही नहीं, बल्कि वाणी, विचार और परिस्थितियों को संभालने में भी होना चाहिए। विवेकपूर्ण मौन कई बार बड़े संकट को टाल देता है।
राजनांदगांव| जैन बगीचा स्थित ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन की शृंखला में खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य श्रेयांश प्रभ सागर ने सोमवार को कहा कि आप कभी झगड़े की शुरुआत मत करो। इसका मतलब यह नहीं है कि आप गलत का साथ दो। भगवान पर भरोसा रखो। भरोसा टूटा तो आपका खुद पर से विश्वास उठ जाएगा मुनि ने कहा कि हर आत्मा में परमात्मा का वास है। आप परमात्मा पर विश्वास करें और इस विश्वास को कभी ना तोड़ें। व्यक्ति भरोसे पर ही जीता है। हर बड़ी-बड़ी व छोटी-छोटी चीजों पर हमें भरोसा होता है। जिस पर भरोसा होता है उस पर शक नहीं होना चाहिए। यदि शक है तो उस शक को बोलकर या पूछ कर दूर कर लेना चाहिए। गलतफहमी और भरोसे के बीच की यदि कोई कड़ी है तो वह है शक। यदि शक पर हम रहे तो किसी के साथ भी अच्छा नहीं रह सकते। मुनि ने कहा कि जब आप संसार में हो तब तक यह सोचो कि ना किसी के प्रति गलत नहीं सोचूंगा। यदि हम गलत सोचते हैं तो यह भी सोचिए कि हम परमात्मा के प्रति भी गलत सोच रहे हैं, क्योंकि हर आत्मा में परमात्मा का वास है।

