राजनांदगांव , श्रावणी पर्व पर मोहारा शिवनाथ नदी तट वैदिक मंत्रों और आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान रहा। गायत्री शक्तिपीठ ने यहां श्रावणी पर्व अनुष्ठान विधि-विधान और वैदिक परंपरा अनुसार संपन्न हुआ। साधकों और श्रद्धालुओं ने नदी तट पर दशविधि स्नान कर आत्मशुद्धि का संकल्प लिया। इसके बाद ऋषि, देव एवं पितरों के निमित्त तर्पण किया गया तथा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यज्ञोपवीत परिवर्तन संस्कार कराया गया। लोक मंगल, पर्यावरण शुद्धि और विश्व कल्याण की कामना की।
गायत्री महामंत्र एवं महा मृत्युंजय मंत्र के साथ हवन-यज्ञ में आहुतियां भी दी गईं। गायत्री शक्तिपीठ के मुख्य प्रबंध ट्रस्टी सूर्यकांत चितलांग्या और व्यवस्थापक ओम प्रकाश के संयोजन में आयोजित यह अनुष्ठान पुरोहित निपाराम और सुखनंदन के वैदिक मार्गदर्शन में संपन्न कराया गया। सुबह से ही ग्राम मोहारा के शिवनाथ नदी तट पर गायत्री परिजन, साधक एवं बड़ी संख्या में धर्म प्रेमी श्रद्धालु पहुंचे थे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालुओं ने पुराहितों के अनुसर निर्धारित विधियों से स्नान और संस्कार संपन्न किया।
यज्ञोपवीत परिवर्तन इसी संस्कार परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा यज्ञोपवीत परिवर्तन को भी इसी संस्कार-परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। नवीन यज्ञोपवीत धारण कर साधकों ने अपने कर्तव्यों, संस्कारों और आध्यात्मिक अनुशासन के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई। मुख्य प्रबंध ट्रस्टी सूर्यकांत चितलांग्या एवं व्यवस्थापक ओम प्रकाश ने बताया श्रावणी पर्व ऋषि परंपरा से जुड़ने के साथ आत्म निरीक्षण और संस्कारों को नया संकल्प देने का अवसर है। नदी तट पर किया गया स्नान तभी सार्थक है, जब साथ व्यक्ति अपने विचार और व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प ले।
अवांछित प्रवृत्ति से दूरी, सात्विक जीवन के लिए प्रेरणा ही उद्देश्य श्रावणी पर्व पर जल को जीवन और पवित्रता का प्रतीक मान स्नान के बाद देव आराधना, तर्पण और दान-पुण्य की परंपरा रही है। मूल भाव व्यक्ति को अहंकार, नकारात्मक विचार और अवांछित प्रवृत्तियों से दूर कर सात्विक जीवन की ओर प्रेरित करना है।
ऋषि, देव और पितृ तर्पण सनातन संस्कार परंपरा में कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। ऋषियों के प्रति ज्ञान एवं संस्कारों देव शक्तियों के प्रति प्रकृति एवं जीवन के संरक्षण, पितरों के प्रति परिवार और परंपरा में योगदान के लिए श्रद्धा व्यक्त की जाती है। तर्पण का संदेश वर्तमान पीढ़ी को जड़ों और पूर्वजों से जुड़े रहने की प्रेरणा देना भी है।

