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CG : मानव तो बन गए, ध्यान रहे मानवता भी बनी रहे : मुनि संवेगरत्न सागर …

CG : मानव तो बन गए, ध्यान रहे मानवता भी बनी रहे : मुनि संवेगरत्न सागर …

CG : मानव तो बन गए, ध्यान रहे मानवता भी बनी रहे : मुनि संवेगरत्न सागर …

धर्मसभा में मिलने वाले संकेतों को समझें,धन-सत्ता नहीं, केवल धर्म जाएगा साथ

रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में ज्ञान की गंगा बह रही है। रविवार को विशेष प्रवचनमाला में मुनि संवेगरत्न सागर ने मानव जीवन की दुर्लभता और मानवता बनाए रखने का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि मानव भव मिलना सौभाग्य है, लेकिन इस भव में मानव बनकर जीना सबसे बड़ी चुनौती है। प्रमाद करते रहे तो यह दुर्लभ भव भी व्यर्थ चला जाएगा।

सड़क के ब्रेकर की तरह जीवन में भी जरूरी है विचार का ब्रेकर

मुनिश्री ने कहा कि सड़क पर वाहन तेज रफ्तार से दौड़ते हैं। रास्ते में संकेत मिलने के बाद भी यदि वाहन नहीं रोका जाए तो दुर्घटना हो सकती है। तेज रफ्तार को नियंत्रित करने के लिए सड़क पर ब्रेकर बनाए जाते हैं। उसी तरह मानव जीवन में भी विचार का ब्रेकर होना चाहिए। धर्मपथ पर कर्म के संकेत मिलते हैं और उन्हें समझकर समय रहते अपने आचरण में बदलाव करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धर्मसभा में भी लाल, हरी और पीली बत्ती के समान संकेत मिलते हैं। जिनवाणी सुनने के बाद यदि इन संकेतों को नहीं समझा और गलत कर्मों से नहीं रुके तो कर्म पीछा नहीं छोड़ेंगे। जीवन में मिलने वाले प्रत्येक धार्मिक संदेश को आत्मसात कर आगे बढ़ना चाहिए।

धन-संपत्ति और सत्ता नहीं, धर्म ही जाएगा साथ
मुनिश्री ने कहा कि पुण्य का उदय हमारे लिए केवल लाभकारी है या वास्तव में हितकारी, इसका ज्ञान होना जरूरी है। धन का कभी गर्व नहीं करना चाहिए और हिंसा से जुड़े कर्मों से बचना चाहिए। आयु का कोई भरोसा नहीं है। सत्ता, संपत्ति और सांसारिक वैभव इस भव के बाद साथ नहीं जाएंगे। मनुष्य के साथ केवल धर्म जाएगा।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान बनना आसान है, लेकिन मानव की पर्याय मिलने के बाद वास्तव में मानव बनना कठिन है। अच्छा मानव बनने के लिए सत्संग करना, बड़ों का सम्मान करना और हिंसक, अप्रामाणिक तथा संस्कृति के विपरीत व्यापार और कार्यों का त्याग करना जरूरी है।

दया धर्म का मूल, किसी के दुख का फायदा न उठाएं
मुनिश्री ने कहा कि देव, गुरु और धर्म का सान्निध्य मिलने के बाद भी यदि जीवन का मर्म नहीं समझा तो इस भव से पार पाना मुश्किल है। किसी के जीवन में दुख आए तो उसका फायदा नहीं उठाना चाहिए। दया धर्म का मूल है। ज्ञान से जितना जुड़ते जाएंगे, जीवन उतना ही सुधरता जाएगा। अशुभ कर्मों के अनुबंध को समय रहते विराम नहीं दिया तो दुख, दुर्गति और पीड़ा का सृजन होगा।

सात्विक भोजन और पारिवारिक संवाद पर दिया जोर
लोक विरुद्ध आचरण की चर्चा करते हुए मुनिश्री ने बाहर के भोजन के त्याग पर भी जोर दिया। मुनिश्री ने कहा कि मिलावटी और अशुद्ध खाद्य-पेय सामग्री शरीर को नुकसान पहुंचा रही है और लोग अनेक बीमारियों से घिर रहे हैं। पहले परिवार के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते थे, जिससे आपसी मधुरता, एकजुटता और संवाद बना रहता था। इसलिए हमेशा सात्विक भोजन ग्रहण करने के साथ परिवार में साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा को बढ़ावा देना चाहिए।

सोशल मीडिया के दुरुपयोग से बचने की सीख
मुनिश्री ने कहा कि आज सोशल मीडिया का दौर है। लोग घंटों सोशल मीडिया में डूबकर अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं और धीरे-धीरे धर्म एवं कर्म से दूर होते जा रहे हैं। सोशल मीडिया का दुरुपयोग व्यक्ति को धर्म मार्ग से विमुख कर सकता है। मुनिश्री ने मर्यादा का सदैव ध्यान रखने और स्वतंत्रता को परतंत्रता का कारण नहीं बनने देने की सीख दी। साथ ही विश्वासघात से बचने का संदेश दिया।

मुनिश्री ने कहा कि जीवन में पुण्य-पाप का बोध हो जाए तो व्यक्ति धर्म के मार्ग से भटक नहीं सकता। मानव भव अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार, व्यवहार और कर्मों पर नियंत्रण रखते हुए मानवता के मार्ग पर चलना चाहिए।

31 अगस्त से अक्षय निधि समवशरण विजय कषाय तप का शुभारंभ
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि सर्व मंगलमय वर्षावास में तप की श्रृंखला लगातार जारी है। 49 दिवसीय पंच परमेष्ठी श्रेणी तप की अंतिम श्रेणी 31 अगस्त से शुरू होगी। साथ 31 अगस्त से 16 दिवसीय अक्षय निधी समवशरण विजय कषाय तप की शुरुआत होगी। मुनि संवेगरत्न सागर आदि थाणा के पावन निश्रा में सोमवार सुबह 8:30 बजे मंगल कलश की स्थापना होगी। तपस्वी 16 दिनों में 15 दिन लगातार एकासना और 16वें दिन उपवास करेंगे। अक्षय निधि तप के पूर्ण होते ही 8 दिवसीय मोक्ष तप का शुभारंभ होगा। इस तप में तपस्वी 7 दिनों तक लगातार एकासना और एक दिन उपवास करेंगे। सर्वमंगलमय वर्षावास में प्रतिदिन श्रावक और श्राविकाएं मुनि भगवंतो से जिनवाणी का श्रवण कर आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं।

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