रायपुर। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) के तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी के कार्यकाल में एक अनुशासनात्मक प्रकरण में लिए गए निर्णय को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आदिम जाति विकास विभाग के तत्कालीन सहायक आयुक्त भूपेंद्र कुमार राजपूत के विरुद्ध वित्तीय अनियमितता के आरोपों की विभागीय जांच में पुष्टि होने के बावजूद उन्हें दंड से राहत देने की आयोगीय प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है।
यह मामला अनुशासनात्मक प्रकरण क्रमांक 19/2020/जी.एस. से जुड़ा है। आरटीआई के माध्यम से प्राप्त केस नोटशीट, शासकीय पत्राचार और संबंधित अभिलेखों के आधार पर आरटीआई कार्यकर्ता आशीष देव सोनी ने आरोप लगाया है कि आयोग के नामांकित सदस्य सुकृत लाल साव ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर राजपूत के विरुद्ध 50 प्रतिशत राशि यानी 1,48,920 रुपये की वसूली तथा ‘परिनिन्दा’ का दंडात्मक अभिमत दर्ज किया था। सदस्य की असहमति के बावजूद अकेले फैसला?
मामले का सबसे गंभीर पहलू आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, अध्यक्ष की राय नामांकित सदस्य के दंडात्मक अभिमत से अलग थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि ऐसी स्थिति में आयोग की लागू प्रक्रिया के अनुसार प्रकरण को निर्धारित वैकल्पिक प्रक्रिया—द्वितीय सदस्य की राय अथवा पूर्ण आयोग के समक्ष निर्णय—के लिए रखा जाना अपेक्षित था। लेकिन आरोप है कि तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी ने पूर्ण आयोग के समक्ष प्रकरण रखे बिना ही अपनी एकल टिप्पणी से दंडात्मक सिफारिश को निरस्त कर दिया। यही बिंदु अब पूरे मामले की वैधानिकता का केंद्रीय सवाल बन गया है।
50 रुपये की रजिस्टर-पंजी 152 रुपये में खरीदने का आरोप विभागीय जांच से जुड़े अभिलेखों में एक और गंभीर वित्तीय अनियमितता का उल्लेख है। जांच के अनुसार, करीब 50 रुपये बाजार मूल्य वाली रजिस्टर-पंजी 152 रुपये की दर से खरीदे जाने के कारण कुल 2,97,840 रुपये के भुगतान को अनियमित माना गया था। नामांकित सदस्य के दंडात्मक अभिमत में इसी वित्तीय अनियमितता को आधार बनाया गया। इसके बावजूद आयोग द्वारा जारी परामर्श में यह निष्कर्ष दर्ज किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं कि भंडार क्रय नियमों का पालन किया गया था।
शिकायतकर्ता का सवाल है कि जब विभागीय जांच में वित्तीय अनियमितता प्रमाणित मानी गई थी, तो उसे खारिज करने के लिए आयोग के समक्ष कौन-सा नया तकनीकी अथवा दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किया गया था? 17-बिंदु वाले सरकारी प्रपत्र में कई अहम कॉलम खाली मामले को और गंभीर बनाने वाला पहलू शासन से आयोग को भेजे गए 17-बिंदुओं वाले शासकीय प्रपत्र से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, जांच रिपोर्ट, साक्ष्य, निलंबन आदेश, गोपनीय चरित्र पंजी सहित कई महत्वपूर्ण कॉलम निरंक/खाली छोड़े गए थे। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि मूल जांच संबंधी महत्वपूर्ण अभिलेख ही पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं थे, तो आयोग ने किन दस्तावेजों के आधार पर आरोपी अधिकारी को राहत देने संबंधी परामर्श तैयार किया? आरोपी अधिकारी नहीं, 73 छात्रावास अधीक्षकों से वसूली की सिफारिश मामले का एक और विवादित पहलू आयोग द्वारा 73 छात्रावास अधीक्षकों से वसूली की सिफारिश किए जाने को लेकर है। शिकायतकर्ता के अनुसार, ये अधिकारी मूल अनुशासनात्मक प्रकरण में अपचारी अधिकारी नहीं थे और उनके विरुद्ध उसी प्रक्रिया में आरोप निर्धारित कर सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया था। इसी आधार पर शिकायत में सवाल उठाया गया है कि आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 320(3)(c) के तहत अपने परामर्शाधिकार की सीमा में रहते हुए यह सिफारिश किस आधार पर की। ‘अभयदान’ के बाद पदोन्नति का भी उठ रहा सवाल शिकायतकर्ता ने मामले को केवल आयोग के एक निर्णय तक सीमित नहीं माना है। उनका आरोप है कि तत्कालीन ट्राइबल सचिव डी.डी. सिंह की भूमिका की भी जांच आवश्यक है। शिकायत के अनुसार, राजपूत को विभागीय कार्रवाई से राहत मिलने के बाद उन्हें पदोन्नति का लाभ मिला और बाद में वे उच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंचे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है। लेकिन शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि मूल अनुशासनात्मक प्रकरण में प्रक्रिया ही नियमसम्मत नहीं थी, तो उसी आधार पर मिली पदोन्नति की वैधता की भी समीक्षा आवश्यक है। अब CGPSC से लेकर सरकार और CBI तक शिकायत दस्तावेज सामने आने के बाद आरटीआई कार्यकर्ता आशीष देव सोनी ने मामले में CGPSC में पुनर्विचार अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के साथ राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग और CBI को भी शिकायत भेजे जाने का दावा किया है। शिकायत में मांग की गई है कि आयोग का जावक क्रमांक 270, दिनांक 17.06.2020 से जारी परामर्श पत्र, उसकी प्रक्रिया और आधारभूत अभिलेखों की स्वतंत्र जांच कराई जाए। साथ ही नामांकित सदस्य के दंडात्मक अभिमत तथा अध्यक्ष की असहमति के बाद अपनाई गई प्रक्रिया की वैधानिकता की जांच करते हुए प्रकरण को आवश्यकतानुसार पूर्ण आयोग के समक्ष पुनर्विचार के लिए रखा जाए। दस्तावेजों ने खड़ा किया सबसे बड़ा सवाल पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है—जब विभागीय जांच में वित्तीय अनियमितता सामने आई, आयोग के नामांकित सदस्य ने दंड की सिफारिश की और अध्यक्ष उससे असहमत थे, तो क्या निर्धारित आयोगीय प्रक्रिया का पालन करते हुए अंतिम निर्णय लिया गया था? आरटीआई से सामने आए दस्तावेज यदि जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक अधिकारी को दंड से राहत देने का मामला नहीं रहेगा, बल्कि CGPSC की निर्णय प्रक्रिया, आयोगीय जवाबदेही और संवैधानिक संस्थान की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा। अब निगाहें इस बात पर हैं कि राज्य सरकार और संबंधित जांच एजेंसियां इन दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच कर क्या निष्कर्ष निकालती हैं।

