राजनांदगांव , यह कोई सामान्य चिट्ठी नहीं थी। राजनांदगांव की माटी और यहां की सहेजी गई जलधारा की कहानी समेटे यह पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचा है। पद्मश्री फूलबासन बाई यादव ने 16 सितंबर को प्रधानमंत्री को लिखे इस पत्र के कागज को राजनांदगांव में बचाई गई उसी जलधारा में भिगोकर सुखाया, ताकि दिल्ली तक पहुंचने वाली इस चिट्ठी के साथ उनकी माटी की सोंधी महक और पानी की पवित्रता भी पहुंचे। उन्होंने पत्र को विश्वास, स्नेह और आस्था का दस्तावेज बताया है।
फूलबासन बाई ने प्रधानमंत्री को बताया कि वर्ष 2001 में उन्होंने अपने गांव सुकुल दैहान में महज दो रुपए और दो मुट्ठी चावल से 10 महिलाओं के साथ स्व-सहायता समूह शुरू किया था। पत्र में उन्होंने जल शक्ति अभियान और ‘कैच द रेन’ से मिली प्रेरणा का जिक्र करते हुए बताया कि महिलाओं के नेतृत्व में ‘नीर और नारी जल यात्रा’ शुरू की गई। इसमें 10 हजार महिला स्व-सहायता समूहों की दो लाख से अधिक महिलाएं जुड़ीं।
कुल श्रमिकों में 70 फीसदी से भी अधिक महिलाएं थीं महिलाओं ने अपने संसाधनों से एक लाख से अधिक सोकपिट बनाए। 40 गांवों की महिलाओं को ग्राफ्टिंग तकनीक सिखाई गई और इसी वर्ष एक लाख से अधिक पौधे लगाए गए। मनरेगा के तहत श्रमदान से 2250 मिनी परकोलेशन टैंक, 600 से अधिक रिचार्ज शाफ्ट, 5000 से अधिक जलस्रोतों का जीर्णोंद्धार और 2.5 लाख से अधिक स्टैगर्ड ट्रेंच-पिट बनाने में महिलाओं ने योगदान दिया। इनमें कुल श्रमिकों में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं थीं।

