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राजनांदगांव : जितनी जरूरत है उतना ही संचय करें और अतिरिक्त को दान कर दें : समयप्रभ सागर…

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डोंगरगांव , विद्यासमय तपो साधना महोत्सव-2026 के तहत दिगंबर जैन परंपरा के दशलक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस शनिवार को उत्तम शौच धर्म की आराधना की गई। श्रीदिगंबर जैन मंदिर की धर्मसभा में वर्षातप के लिए विराजित आर्यिका मां 105 तपोमती माता जी ने उत्तम शौच धर्म के महत्व पर प्रवचन दिया।

पांच आर्यिका माता के सानिध्य में चल रहे धार्मिक आयोजनों में श्रावक-श्राविकाओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। आर्यिका मां तपोमती ने शास्त्रों में वर्णित उत्तम शौच धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि शौच का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और आत्मा की शुद्धि है। लोभ मन को अशांत करता है और व्यक्ति को वस्तुओं के संग्रह तथा इच्छाओं के बंधन में बांधता है।

इसलिए लोभ का त्याग, संतोष का भाव और आत्मा के प्रति जागरूकता ही उत्तम शौच धर्म की साधना है। कहा कि बाहरी स्वच्छता शरीर और वातावरण को निर्मल बनाती है, लेकिन भीतर के लोभ, राग-द्वेष, कपट और आसक्ति को दूर करना आत्मिक शुद्धता का मार्ग है। मन जितना लोभ और इच्छाओं से मुक्त होता जाता है, उतना ही व्यक्ति सहज, शांत और संतुष्ट बनता है। उत्तम शौच हमें यह प्रेरणा देता है कि संसार की वस्तुओं में सुख खोजने के बजाय अपनी आत्मा की ओर लौटें।

राजनांदगांव| ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में शनिवार को खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य समयप्रभ सागर ने कहा कि नाड़ी चलते तक कुछ अर्जित कर लो, नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा। संचय करना अच्छा है किंतु उसका उपयोग नहीं किया तो बाद में अफसोस रह जाएगा। बुद्धिमान व्यक्ति तर्कवान हो सकता है लेकिन जब तक वह विनयवान नहीं होगा तब तक उसके बुद्धिमान होने का कोई मूल्य नहीं। कहा कि सत्य कहने में ही हमारा हित है। जितनी जरूरत है उतना ही संचय करें। अतिरिक्त को दान कर दें। दान करने से पुण्य बढ़ता है।

साधना का मार्ग कठिन है किंतु उसका फल सबसे ज्यादा मीठा है। आपको स्वयं अपनी आसक्ति छोड़ने के लिए मेहनत करनी होगी। मोह का त्याग जरूरी है। जिन्होंने जीवन भर संचय किया है और उसका उपयोग नहीं किया तो अंतिम समय में उसके पास पछताने के सिवाय और कुछ नहीं होगा। मुनि ने कहा कि ऐसा युग आ गया है कि बेटे अपने मां-बाप को पालने से कतराने लगे हैं। एक बाप अपने पांच बेटों को तो पाल सकता है लेकिन पांच बेटे मिलकर भी मां-बाप को नहीं पाल पाते।

आराधना जीवन से जोड़ने का माध्यम है दशलक्षण पर्व को लेकर दिगंबर जैन मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है। रंग-बिरंगी लाइटिंग और झालरों से सजा मंदिर परिसर रात्रि में अपनी भव्यता से श्रद्धालुओं का मन मोह रहा है। रात्रि में आयोजित संगीतमय सांस्कृतिक कार्यक्रम भी धर्म आराधना को जीवन-मूल्यों से जोड़ने का माध्यम बन रहे हैं। कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक संदेश के साथ जीवन को सरल, संयमित और संस्कारित ढंग से जीने की प्रेरणा दी जा रही है। इनमें समाज के सभी वर्गों के श्रावक-श्राविका भाग ले रहे हैं।

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