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CG : सुसाइड नोट ने खोली प्रताड़ना की कहानी, हाईकोर्ट ने दोषी की अपील की खारिज …

CG : सुसाइड नोट ने खोली प्रताड़ना की कहानी, हाईकोर्ट ने दोषी की अपील की खारिज …

CG : सुसाइड नोट ने खोली प्रताड़ना की कहानी, हाईकोर्ट ने दोषी की अपील की खारिज …

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला को लगातार प्रताड़ित करने और जान से मारने व तेजाब फेंकने की धमकी देने के मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी की अपील खारिज कर दी। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में निचली अदालत की सजा बरकरार रखी। आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत पांच साल के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने उसे चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

अभियोजन के अनुसार 24 मई 2013 को मंजू शर्मा ने रायपुर के 36 सिटी मॉल स्थित सिनेमा हॉल में सल्फास की गोलियां खा ली थीं। उन्हें डॉ. बीआर अंबेडकर स्मृति अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस को मृतका के पर्स से सुसाइड नोट, सल्फास की गोलियों का पाउच और अन्य सामान मिला था। मृतका के विसरा की रासायनिक जांच में एल्युमिनियम फॉस्फाइड की पुष्टि हुई, जो सल्फास के सेवन का प्रमाण था। सुसाइड नोट में मंजू शर्मा ने अपनी मौत के लिए बबली सिंह उर्फ बबलू सिंह को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने आरोपी पर लगातार परेशान करने और गंभीर धमकियां देने की बात लिखी थी। मामले में सामने आया कि मृतका विवाहित थी और पति के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण थे। अभियोजन के मुताबिक आरोपी ने इस परिस्थिति का फायदा उठाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में उसे प्रताड़ित करने लगा। गवाहों ने भी आरोपी की ओर से की जा रही प्रताड़ना से जुड़े तथ्यों की पुष्टि की।

अभियोजन ने परिजनों के बयानों के साथ सुसाइड नोट पर हस्ताक्षर की विशेषज्ञ जांच रिपोर्ट भी पेश की। रिपोर्ट में नोट पर मिले हस्ताक्षर का मृतका के बैंक खाते से संबंधित दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षरों से मिलान हुआ। बचाव पक्ष ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए दोषसिद्धि को चुनौती दी, जबकि राज्य की ओर से लगातार प्रताड़ना और गंभीर धमकियों को आत्महत्या का कारण बताया गया। हाईकोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के हर मामले में सामान्य विवाद या प्रताड़ना का आरोप अपने आप में पर्याप्त नहीं होता। अभियोजन को आरोपी के आचरण, उसकी मंशा और आत्महत्या के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना होता है।

अदालत ने पाया कि यह मामला किसी एक विवाद या क्षणिक गुस्से का नहीं था। आत्महत्या से पहले लगातार प्रताड़ना और गंभीर धमकियों का सिलसिला था। मृतका ने अपने सुसाइड नोट में भी आरोपी को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया था। इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपी के कृत्यों और आत्महत्या के बीच आवश्यक संबंध तथा उकसाने की मंशा साबित करने में सफल रहा है। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया और अपील खारिज कर दी। जमानत पर बाहर चल रहे आरोपी को शेष सजा भुगतने के लिए चार सप्ताह के भीतर संबंधित निचली अदालत में आत्मसमर्पण करना होगा। निर्धारित अवधि में सरेंडर नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट उसे हिरासत में लेकर सजा लागू कराने की कार्रवाई करेगा।

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