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राजनांदगांव : 6 दशकों तक देश-विदेश में गूंजती रही बांस गीत की धुन, दिलाई छत्तीसगढ़ को पहचान…

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राजनांदगांव , छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और लोकगाथा बांस गीत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विशिष्ट पहचान दिलाने वाले प्रख्यात बांस वादक विक्रम यादव का 29 अक्टूबर को सुबह 5 बजे निधन हो गया। 85 वर्षीय विक्रम यादव ग्राम खैरा (रवेली) जिला राजनांदगांव के निवासी थे। वे पिछले कई दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन से छत्तीसगढ़ के लोककला जगत ने एक ऐसे साधक को खो दिया, जिन्होंने अपनी छह दशकों से अधिक की कला-यात्रा में विलुप्त होती बांस वादन परंपरा को सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए जीवन समर्पित कर दिया। उनका अंतिम संस्कार गृहग्राम खैरा में किया गया। उन्हें मध्यप्रदेश शासन ने प्रतिष्ठित तुलसी सम्मान से सम्मानित किया था।

विक्रम यादव केवल बांस वादक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा के संवाहक थे। बांस, बांसुरी और बीन वादन में उनकी अद्भुत प्रतिभा, साधना और समर्पण ने लोककला को नई पहचान दी। उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोकगाथा बांस गीत की विलुप्त होती परंपरा को अपने सुरों के माध्यम से जीवंत बनाए रखा। उनकी कला में लोकजीवन की संवेदनाएं, परंपरा की गहराई और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत की झलक मिलती थी। वर्ष 1971 में वे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त रंगकर्मी हबीब तनवीर के नया थिएटर से जुड़े। इसके बाद रायपुर, दिल्ली, भोपाल, कोलकाता, दुर्गापुर, शोलापुर, पुणे, हरियाणा, कोल्हापुर, सतारा, मुंबई और अहमदाबाद सहित देश के अनेक शहरों में अपनी कला का प्रदर्शन किया। विदेशों में भी उन्होंने बांस वादन की प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़ की लोककला का गौरव बढ़ाया। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष भी उन्हें अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिला।

‘बस्तर बैंड’ से भी जुड़े रहे मिला प्रतिष्ठित सम्मान वर्ष 2007 में रंगकर्मी अनुपरंजन पांडेय के ‘बस्तर बैंड’ से जुड़कर विक्रम यादव ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा को और विस्तार दिया। देश-विदेश के विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने लोकवाद्य और लोक परंपरा की विशिष्टता को सामने रखा। उनकी दीर्घ कला-साधना को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 2007 में युवा कुर्मी मित्र मंडल, भिलाई ने उन्हें ‘भुइयां सम्मान प्रदान किया। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने वर्ष 2018 में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय तुलसी सम्मान दिया। वर्ष 2022 में गुरु घासीदास लोक कला महोत्सव, ककरेल और भारतीय जन नाट्य संघ ने भी उन्हें सम्मानित किया।

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