रायपुर। छत्तीसगढ़ में उद्योगपतियों की दादागिरी खुलकर चल रही है। बड़े व्यापारिक घरानों या कंपनियों द्वारा अपने फायदे के लिए नियमों को ताक पर रखकर सरकारी, चारागाह की जमीन को भी कब्जाने में कोताही नहीं बरत रहे। इस मामले में राजस्व विभाग और उद्योग विभाग के अधिकारी कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आती है लेकिन शासन इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर पाती। ये उद्योगपति स्थानीय लोगों और छोटे व्यवसायों पर अनुचित दबाव बनाने से भी बाज नहीं आते। ग्रामीण जब थाने की ओर रूख करते हैं तो थाने वाले भी उन उद्योगपतियों का ही साथ देते हैं।
ज़मीन और पानी के स्रोतों पर बिना सहमति के ज़बरन कब्ज़ा औद्योगिक इकाइयाँ किसानों या समुदायों की ज़मीन और पानी के स्रोतों पर बिना उनकी सहमति के ज़बरन कब्ज़ा कर लेती हैं, जबकि नियम है की ग्राम सभा में जमीं देने कका प्रस्ताव पास हो और जान सुनवाई हो तब जाकर ही निजी या सरकारी जमीनों को ले सकते हैं बिना सहमति के नहीं ले सकते लेकिन अधिकतर मामले में उद्योगपति किसी नियम और शर्तो का पालन नहीं करते। छुटभैये नेता बनाते है अराजकता की स्थिति
छुटभैये नेताओ सहित स्थानीय नेता भी अपने आदमियों को नौकरी देने की शर्त रखते हैं जिसके वजह से वे किसी उद्योगपति पर अनावश्यक दबाव भी नहीं बना सकते। इसी का फायदा उठा कर मनमानी करते है। जबकि नियमत: जिस किसान की जमीन अधिग्रहित की जाती है उनके घर वालों को नौकरी देना नियम में होता है। यदि नौकरी दे भी दिए तो छोटे पद पर ही रखते हैं और उच्च पदों पर गैर छत्तीसगढिय़ो को ही रखते हैं और वे छत्तीसगढिय़ों का खुले आम दमन भी करते हैं। इस तरह से अराजकता की स्थिति बनती है और नए निवेशक आने में डरते हैं, नए निवेशकों का भरोसा टूटता है, जो हमारे राज्य के विकास में एक बड़ी रुकावट बन जाती है।
आम जनता का स्वास्थ्य खतरे में पर्यावरण के नियमों की अनदेखी: कई उद्योग अपने कचरे और प्रदूषण को सही तरीके से नष्ट करने के बजाय आसपास के नदियों या ज़मीन में छोड़ देते हैं, जिससे आम जनता का स्वास्थ्य खतरे में पड़ता है। रायपुर जिसे सहित आसपास के जिलों में नदियां भी इनके वजह से प्रदूषित हो गई है। इस मनमानी को रोकने के लिए सरकारें और अदालतें समय-समय पर सख्त नियम लागू करती हैं। बिना सहमति के जबरिया खुदाई किसानों की उपजाऊ ज़मीन पर बिना उनके सहमति के जबरिया खुदाई, बिना सहमति के कारन खेती का रकबा भी घटने लगा है। जबकि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता था लेकिन इन उद्योगों के अवैत कब्ज़ा से अब धान का कटोरा भी कहलाने लायक नहीं बचा है। उप मुख्यमंत्री अरुण साव का ध्यान आकर्षित किया विधानसभा में सत्ता पक्ष के रिकेश सेन ने बात उठाई की दुर्ग जिले के अंतर्गत जेके लक्ष्मी सीमेंट लिमिटेड द्वारा भवन अनुज्ञा हासिल किये बिना अवैध निर्माण कर लिया जिससे पर्यावरण को काफी क्षति पहुंच रही है इस सम्बन्ध में उन्होंने नगरीय प्रशासन मंत्री और उप मुख्यमंत्री अरुण साव का ध्यान आकर्षित कराया है। दलेश्वर साहू ने भी अपने क्षेत्र के अंतर्गत जिला खैरागढ़ छुईखदान गंडई में निजी कंपनी द्वार भूमि पर अवैध कब्ज़ा किये जाने की बात कही है। वहीं ब्यास कश्यप विधायक ने भी जांजगीर चाम्पा जिले में कोटवारी भूमि को बेचने खरीदने का मामला उठाया जबकि नियमत: कोटवारी जमीन पूरी तरह से सरकारी होती है और सरकारी जमीन की खरीद फरोख्त करना नहीं है। कांग्रेस विधायक इंद्र साव ने भी बलौदाबाजार भाटापारा जिले के सिमगा तहसील के ग्राम केसदा में शासकीय जमीन को एक कंपनी स्वदेश मेटालिक इस्पात संयंत्र को नियम विरुद्ध आबंटित किये जाने की जानकारी सदन में दी है। ग्रामीणों और किसानों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर चुके है पिछले दिनों श्री सीमेंट परियोजना के विरोध में किसानों और ग्रामीणों का बड़ा आंदोलन भी कर चुके हैं खैरागढ़ जिले में श्री सीमेंट परियोजना के विरोध में ग्रामीणों और किसानों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर चुके हैं। हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने प्रस्तावित सण्डी चूना पत्थर खदान और सीमेंट प्लांट के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर प्रदर्शन और चक्का जाम भी कर चुके हैं। ग्रामीणों ने एकजुटता का परिचय देते हुए प्रस्तावित खदान क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले 39 गांवों ने औपचारिक रूप से परियोजना के खिलाफ लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। सण्डी, पंडारिया, विचारपुर और भरदागोड़ पंचायतों ने ग्रामसभा प्रस्ताव पारित कर स्पष्ट किया कि वे किसी भी कीमत पर चूना पत्थर खदान को मंजूरी नहीं देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि खदान शुरू होने से जलस्रोत सूखने, खेती-किसानी प्रभावित होने, पशुपालन पर खतरा मंडराने और पर्यावरण को गंभीर नुकसान होने की आशंका बताया था। इसी बात को लेकर वे विरोध करने इक_े होकर कंपनी के खिलाफ मोर्चा भी खोल रखे थे। जमीन जलस्रोतों पर किसी प्रकार का समझौता करने तैयार नहीं प्रदर्शनकारी ग्रामीणों ने स्पष्ट किया था कि उनका संघर्ष तब तक जारी रहेगा श्री सीमेंट परियोजना से जुड़े निर्णय वापस नहीं लिए जाते। यह आंदोलन केवल भूमि या पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि स्थानीय लोगों के अस्तित्व, आजीविका और भविष्य की सुरक्षा का बड़ा संघर्ष बन गया है। हजारों किसानों का यह शक्ति प्रदर्शन यह स्पष्ट संकेत देता है कि जनता अपनी जमीन और जलस्रोतों पर किसी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे । इसके साथ ही आंदोलनकारियो ने यह संदेश भी दिया था कि गांवों के लोग अपने हक, संसाधन और प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिए हमेशा सक्रिय रहेंगे।