राजनांदगांव , जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन में खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य श्रेयांशप्रभ सागर ने गुरुवार को कहा कि हम खुद को भूलकर सबके लिए करते हैं जो कि गलत है।
हम यदि कुछ कर रहे हैं तो पहले स्वयं के लिए करें फिर परिवार और फिर अन्य के लिए। क्षमता से अधिक कार्य न करें और यदि अधिक कार्य करना है तो अपनी क्षमता बढ़ाएं। कहा कि दूसरों की भलाई के लिए हम खुद को भूल जाते हैं। हम इस भलाई के चक्कर में न स्वयं को देख पाते हैं और ना ही परिवार को। कहा कि खुद पर भी ध्यान दो।
जो हमेशा सबके लिए करता है, हम उसे ही महान मानते हैं जबकि वह महान नहीं है। इसी तरह जो अपने लिए ही करता है, हम उसे स्वार्थी मानते हैं जबकि ऐसा नहीं है। आप जब स्वयं का भला नहीं करेंगे तो दूसरों का भला कैसे कर पाएंगे। दूसरों को जानने से पहले स्वयं को जानना जरूरी है। मुनि ने कहा कि आप सब का भला करना चाहते हैं तो करें लेकिन क्षमताओं से ज्यादा नहीं।
अगर ज्यादा कुछ करना ही है तो अपनी क्षमताओं को बढ़ाएं। हम मनुष्य बन जाए यही बहुत है। आप खुद का भला कर लो फिर दूसरे का भला करो। सोचने वाले को कोई नहीं रोक सकता। हर महान व्यक्ति को देख लो पहले उन्होंने आलोचना झेली, जब वे महान बन गए तब आलोचना करने वाले ही माला पहनाने में आगे नजर आए। अगर आप महान बन जाओगे तो आज जो आपको गलत कह रहे हैं, वे ही कल आपको सही कहेंगे।
