Durg : मिट्टी को आकार दिया, जिंदगी संवार लीरू नीरा बनीं लखपति दीदी
बोरेन्दा की नीरा ने बिहान से मिली नई राह को बनाया अपनी ताकत द्य पारंपरिक मिट्टी कला को कारोबार में बदला, अब ₹1.20 लाख सालाना आय
दुर्ग(मनीष त्रिपाठी पत्रकार)। मिट्टी से बर्तन बनाना उनके परिवार का पारंपरिक हुनर था, लेकिन कभी यही हुनर सीमित आमदनी तक सिमटा हुआ था। परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए मेहनत तो खूब होती थी, लेकिन कमाई के साधन सीमित थे। फिर बिहान से जुड़ाव हुआ और इस पारंपरिक हुनर को नई दिशा मिली। ग्राम पंचायत बोरेन्दा, जनपद पंचायत पाटन की श्रीमती नीरा चक्रधारी ने स्व-सहायता समूह के सहयोग और अपने निरंतर परिश्रम से मिट्टी के काम को आजीविका का मजबूत साधन बना लिया।
आज नीरा केवल मिट्टी के बर्तन ही नहीं बनातीं, बल्कि गणेश एवं लक्ष्मी माता की मूर्तियां और पोला पर्व के पारंपरिक नंदी बैल भी तैयार करती हैं। उनके इस प्रयास से उनकी वार्षिक आय बढ़कर लगभग ₹1.20 लाख हो गई है। ₹35 हजार की लागत से शुरू की गई गतिविधि अब परिवार की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।
समूह से जुड़ीं, तो मिली आगे बढ़ने की राह
नीरा जय मां संतोषी स्व-सहायता समूह की सदस्य हैं। समूह का गठन 22 नवंबर 2019 को हुआ था। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें नियमित बैठक, बचत, आंतरिक ऋण और आजीविका गतिविधियों के संबंध में जानकारी मिली। बैठकों के माध्यम से महिलाओं को अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने और स्वयं की आय का साधन विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाता था।
नीरा ने समूह से मिले मार्गदर्शन को केवल जानकारी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारा। उन्होंने अपने पारंपरिक काम को बड़े स्तर पर करने की योजना बनाई और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए इसे व्यवस्थित आजीविका गतिविधि के रूप में विकसित किया।
मिट्टी के बर्तन से लेकर पोला के नंदी बैल तक
बिहान से जुड़ने से पहले नीरा अपने पति के साथ मिलकर मिट्टी के बर्तन, घड़ा, कटोरी, चम्मच और दीये बनाती थीं। पोला पर्व के अवसर पर नंदी बैल भी तैयार करती थीं। लेकिन सीमित पूंजी के कारण काम का विस्तार नहीं हो पा रहा था और आमदनी भी कम थी।
इसके बाद उन्होंने बिहान के तहत बैंक ऋण, आरएफ और सीआईएफ के माध्यम से उपलब्ध वित्तीय सहयोग का उपयोग किया। संसाधन मिलने के साथ उन्होंने धीरे-धीरे अपने व्यवसाय का विस्तार किया। मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों के साथ गणेश एवं लक्ष्मी माता की मूर्तियों और पोला के नंदी बैलों का निर्माण भी बड़े स्तर पर शुरू किया।
इस तरह नीरा ने अपनी पुरानी कला को ही अपनी नई आर्थिक ताकत बना लिया।
कमाई बढ़ी तो मजबूत हुआ परिवार
नीरा ने व्यवसाय से होने वाली कमाई का एक हिस्सा परिवार की आवश्यकताओं में लगाया और कुछ राशि को दोबारा अपने व्यवसाय में निवेश किया। इस सोच ने उनकी गतिविधि को लगातार आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे काम का दायरा बढ़ा और परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगा। आज उनकी वार्षिक आय लगभग ₹1.20 लाख तक पहुंच चुकी है।
उनकी सफलता यह भी दिखाती है कि ग्रामीण क्षेत्र में मौजूद पारंपरिक हुनर को यदि सही समय पर वित्तीय सहयोग, मार्गदर्शन और समूह का साथ मिले, तो वह स्थायी आय का साधन बन सकता है।
कलेक्टर श्री अभिजीत सिंह द्वारा बताया गया कि
“ग्रामीण महिलाओं की प्रतिभा और पारंपरिक हुनर को आजीविका से जोड़ना आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। नीरा चक्रधारी की सफलता यह साबित करती है कि स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को उचित मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग मिले तो वे अपने हुनर को व्यवसाय में बदलकर परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती हैं। जिला प्रशासन का प्रयास है कि अधिक से अधिक महिलाओं को आजीविका गतिविधियों से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनने के अवसर उपलब्ध कराए जाएं।”
सीईओ जिला पंचायत श्री बजरंग कुमार दुबे का बताया गया
“बिहान के माध्यम से स्व-सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं। श्रीमित नीरा चक्रधारी दीदी ने समूह से मिले सहयोग, ऋण और मार्गदर्शन का उपयोग अपने पारंपरिक हुनर को विस्तार देने में किया और आज अपनी मेहनत से लखपति दीदी बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि स्थानीय हुनर और उपलब्ध संसाधनों को सही दिशा देकर ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम कर सकती हैं। जिला पंचायत ऐसी आजीविका गतिविधियों को निरंतर प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
नीरा की कहानी, आत्मनिर्भरता की कहानी
नीरा की सफलता सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें ग्रामीण महिलाएं समूह, बचत, वित्तीय सहयोग और अपने हुनर के बल पर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। आज जिस मिट्टी को नीरा अपने हाथों से आकार देती हैं, वही मिट्टी उनके परिवार के भविष्य को भी आकार दे रही है। उनका सफर बताता है कि हुनर कभी छोटा नहीं होता, जरूरत होती है उसे सही अवसर देने की।
बिहान से मिले सहयोग ने नीरा को वह अवसर दिया और उन्होंने अपनी मेहनत से उसे सफलता में बदल दिया। अब उनकी कहानी गांव की दूसरी महिलाओं को भी अपने पारंपरिक हुनर को आजीविका में बदलने और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे रही है।
