राजनांदगांव : परिग्रह की ममता छोड़ अकिंचन भाव अपनाना ही उत्तम…
डोंगरगांव , श्रीविद्यासमय तपो साधना महोत्सव-2026 के अंतर्गत दिगंबर जैन परंपरा के दशलक्षण महापर्व के नवम दिवस गुरुवार को उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना की गई। श्रीदिगंबर जैन मंदिर की धर्मसभा में वर्षातप (चातुर्मास) के लिए विराजित आर्यिका मां 105 तपोमती माता ने परिग्रह, ममता और आसक्ति के त्याग पर प्रवचन दिया।
कहा कि आकिंचन्य का अर्थ है किसी भी बाहरी वस्तु को अपना मानकर उसके प्रति ममत्व न रखना। धन, संपत्ति, वस्तुएं और संसार की उपलब्धियां हमारे पास हो सकती है, लेकिन जब मन उनमें ‘मेरा’ और ‘मैं’ का भाव जोड़ देता है, तब वही परिग्रह आत्मा के लिए बंधन का कारण बन जाता है। कहा कि मनुष्य जितना अधिक बाहरी वस्तुओं के संग्रह और सुरक्षा में उलझता है, उतना ही उसका मन अशांत होता जाता है।
सच्चा सुख वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि उनसे उत्पन्न मोह और आसक्ति से मुक्त होने में है। उत्तम आकिंचन्य धर्म व्यक्ति को भीतर से हल्का, निर्भार और आत्मचिंतन की ओर ले जाता है। आकिंचन्य केवल धन-संपत्ति छोड़ने का नाम नहीं है। क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष, अहंकार और देह के प्रति अत्यधिक ममता का त्याग भी आकिंचन्य की साधना है। जब मनुष्य इन आंतरिक परिग्रहों से मुक्त होने का प्रयास करता है, तब आत्मा की शुद्धता का मार्ग प्रशस्त होता है।
दशलक्षण महापर्व हमें प्रतिदिन आत्मा के एक गुण का स्मरण कराता है। उत्तम आकिंचन्य के माध्यम से यह समझने की आवश्यकता है कि संसार की वस्तुएं स्थायी नहीं हैं, इसलिए उनके प्रति अत्यधिक मोह रखना आत्मकल्याण में बाधक है। जीवन में आवश्यक वस्तुओं का उपयोग करते हुए भी मन को ममता और आसक्ति से मुक्त रखना ही इस धर्म की वास्तविक साधना है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित होकर प्रवचन श्रवण एवं धार्मिक अनुष्ठानों का लाभ ले रहे हैं।
