CG : लोभ हावी हुआ तो न्याय-नीति और सद्व्यवहार से दूर हो जाता है जीव : मुनि संवेगरत्न सागर …
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में गुरुवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने लोभ ध्यान से बचने का संदेश दिया। आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से मुनिश्री ने लोभ को आत्मकल्याण और मोक्ष के मार्ग में बाधक बताया।
मुनिश्री ने कहा कि राग के कारण ही लोभ ध्यान चलता रहता है। लोभ जितना हावी होता है, जीव उतना ही न्याय, नीति और सद्व्यवहार से दूर होता जाता है। लोभ में फंसा व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं के संग्रह और इच्छाओं की पूर्ति में उलझ जाता है। इससे उसके आचरण में विकार आने लगते हैं और वह अतिचार -अनाचार की ओर बढ़ सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि लोभ ध्यान के कारण जीव देव, गुरु और धर्म के सान्निध्य से भी दूर हो जाता है। इसलिए लोभ की प्रवृत्ति को पहचानकर उससे मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। लोभ को छोड़े बिना मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ना संभव नहीं है।
मुनिश्री ने कहा कि धर्म का सेवन करने से धीरे-धीरे सभी दुर्ध्यान दूर होते हैं। इसके बाद सम्यक ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। देव, गुरु और धर्म का आलंबन ही जीव को कषायों से मुक्त कर सकता है। यही उसे दुख, दुर्गति और पीड़ा की परंपरा से बाहर निकालने में सहायक बनता है।
मुनिश्री ने कहा कि सम्यक ज्ञान ही दुर्ध्यानों से मुक्ति का मार्ग है। धर्म का आचरण केवल सांसारिक सुख के लिए नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से होना चाहिए। लोभ सहित अन्य कषायों से बचते हुए संयम, सद्व्यवहार और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
