स्कूली जीवन के एक पायदान पर पहुंचने के बाद बेटियों को एक अजीब-सी हिचक, चिंता और पीड़ा झेलनी पड़ती है। असल में देखा जाए, तो यह समग्र समाज की साझा चिंता है। तभी तो यह लड़कियों में आयु वर्ग के अनुसार आए बदलाव भर नहीं, बल्कि उनके स्वास्थ्य और सम्मान से जुड़ा अहम पक्ष भी है। यह बेटियों की शिक्षा से जुड़ा मामला भी है, क्योंकि ड्रॉप आउट की एक बड़ी वजह माहवारी से जुड़ी परेशानियां ही हैं। अधिकतर समस्याएं लड़कियों के लिए स्वच्छ शौचालय न होने, बंधा-बंधाया सामाजिक व्यवहार और इन विशेष दिनों में बदलती मनःस्थिति से ही जुड़ी हैं। यही वजह है कि माहवारी के शुरुआती पड़ाव पर देश के हर हिस्से में स्कूली बच्चियों को मानसिक तनाव और मनोवैज्ञानिक उलझनें घेर लेती हैं।
सुखद है कि हाल ही में आया उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय बड़ी होती बेटियों के जीवन से जुड़े अहम पहलू पर सहजता लाने की बात लिए है। गौरतलब है कि स्कूली लड़कियों को निःशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की मांग वाली याचिका पर न्यायालय ने केंद्र सरकार को विशेष निर्देश दिए हैं। निर्देशों में सभी स्कूलों व शिक्षण संस्थानों को वहां पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड देने के लिए पैड्स की वेंडिंग मशीन लगाने से लेकर निस्तारण के लिए समुचित व्यवस्था करने की बात शामिल है। यह आदेश अपर प्राइमरी, सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी कक्षाओं वाले उन सभी विद्यालयों पर लागू होगा, जहां लड़कियां पढ़ती हैं। इतना ही नहीं, न्यायालय ने सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के लिए माहवारी के दौरान स्वच्छता सुनिश्चित करने हेतु मानक आदर्श प्रक्रिया और प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल विकसित करने तथा चार सप्ताह के अंदर रिपोर्ट पेश करने को कहा है। देश के स्कूलों में माहवारी को ध्यान में रखते हुए एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्णय देते हुए अदालत ने माहवारी के दौरान स्वच्छता की अहमियत को एक गंभीर मुद्दा माना है।
दरअसल, दूर-दराज के गांवों से लेकर महानगरों की कच्ची बस्तियों तक, आज भी ऐसे परिवार की बड़ी संख्या है, जो बेटियों की इस जरूरत के लिए पैसे खर्च करने में असमर्थ हैं। साथ ही कई परिवारों में सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता का भी अभाव है। ग्रामीण इलाकों में तो महिलाओं में इसे लेकर कई तरह की भ्रांतियां देखने को मिलती हैं। विडंबना ही है कि पुराना कपड़ा, राख और कागज जैसी चीजों का आज भी इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी अस्वच्छ, असुविधाजनक और असुरक्षित विकल्प हैं, जो हर आयु वर्ग की महिलाओं में स्वास्थ्य से जुड़े खतरों के कारण बनते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कह चुका है कि भारत में महिलाओं की स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए सैनिटरी नैपकिन के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। यही वजह है कि सैनिटरी पैड की स्कूलों में सहज और निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित करना ही नहीं, बाजार में भी इनका किफायती कीमत पर मिलना जरूरी है।
2018 में जीएसटी काउंसिल की बैठक में जिन 88 वस्तुओं पर टैक्स कम किया गया था, उनमें सैनिटरी नैपकिन भी शामिल थे। आंकड़े बताते हैं कि भारत में करीब 70 फीसदी महिलाएं यौन संचारित रोगों से पीड़ित हैं। संक्रमण की ऐसी व्याधियां माहवारी के दिनों की अस्वच्छता के कारण भी फैलती हैं। गर्भाशय के कैंसर तक के मामले सामने आ रहे हैं, जबकि ‘सैनिटरी प्रोटेक्शन-एवरी वुमंस हेल्थ राइट’ नाम से हुए एक अध्ययन में भी सामने आ चुका है कि माहवारी में हमारे यहां बड़ी संख्या में महिलाएं पुराने तरीकों का प्रयोग करती हैं, क्योंकि वे सैनिटरी नैपकिन खरीदने में सक्षम नहीं हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, दूर-दराज के गांवों-कस्बों के स्कूलों में तो कई बच्चियां, पीरियड्स के दौरान पांच दिन तक स्कूल से अनुपस्थित ही रहती हैं, क्योंकि अनेक ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को सैनिटरी पैड के इस्तेमाल की जानकारी ही नहीं है। ऐसे में शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान के लिए स्कूली छात्राओं के लिए मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध करवाना आवश्यक है। सैनिटरी नैपकिन स्कूली छात्राओं की अनिवार्य जरूरतों में से एक है, इससे बेटियों को उन दिनों की असहजता और परेशानियों से भी निजात मिलेगी और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम भी कम होंगे।
