राजनांदगांव : प्रत्येक कहानी में संदेश होता है, अपनाना सीखो-श्रेयांशप्रभ जी
जैन बगीचे में चातुर्मासिक प्रवचन
राजनांदगांव आठ अक्टूबर । ” कहानियां हम सुनते हैं परंतु सीख ग्रहण नहीं करते। प्रत्येक कहानी के पीछे कोई ना कोई संदेश होता है जिसे हमें ग्रहण करना चाहिए। ऐसी ही हर घटना हमें कुछ न कुछ सीख अवश्य दे जाती है।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर ग्रहण करने का गुण होना चाहिए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि हम मंदिर तो जाते हैं किंतु क्या हम जितना समय मंदिर में होते हैं, उतना समय हमारा ध्यान परमात्मा की ओर रहता है। दरअसल हम मंदिर तो जाते हैं परमात्मा के दर्शन के लिए लेकिन हमारा ध्यान /मन कहीं और रहता है! हम जितने समय मंदिर में है,कम से कम उतना समय तो परमात्मा को दें। उन्होंने कहा कि हम वंदन करते हैं, यह वंदन ही बहुमान है।
मुनि ने कहा कि हम बहुमान करते समय यदि यह सोचते कि जिनका हम बहुमान कर रहे हैं, उनका जीवन कैसा है,उनका क्या आदर्श है ,क्या मैं उन आदर्शों को अपना सकता हूं अर्थात जिस गुण को लेकर हम बहुमान करते हैं उस गुण को हमें भी अपनाकर बहुमान करना चाहिए तभी यह सच्चा बहुमान होगा। दरअसल सबसे मुश्किल काम है किसी की अच्छाई देखना और उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है उन अच्छाइयों को अपनाना ।
इन सबसे ज्यादा मुश्किल काम है किसी अपने की अच्छाई को देखना और उसे अपनाना। बहुमान एक -दूसरे के प्रति, एक- दूसरे के भाव को अपनाकर करें तो सही मायने में बहुमान होगा। उन्होंने कहा कि छोटा बड़ा कुछ नहीं होता एक -दूसरे के प्रति सम्मान का भाव ही सबकुछ है। मुनि ने कहा कि अपने आदर्श भाव को प्रकट करो और जितना हो सके किसी के अच्छे गुण को थोड़ा-थोड़ा करके अपनाने का प्रयास करो।
