राजनांदगांव : बौद्ध समाज की राजनीतिक, आर्थिक और औद्योगिक भागीदारी बढ़ाने पर चिंतन जरूरी...
राजनांदगांव , बौद्ध कल्याण समिति राजनांदगांव के द्वारा बुधवार को धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर सांस्कृतिक भवन सिविल लाइन में विचार गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी का विषय डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की धम्म दीक्षा के 70 वर्ष बौद्ध समाज ने क्या खोया और क्या पाया?” रखा गया। इसमें समाज की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर विचार-मंथन किया गया।
बौद्ध कल्याण समिति के अध्यक्ष दीपांकर खोबरागड़े ने कहा कि डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने गहन चिंतन और अध्ययन के बाद बौद्ध धम्म स्वीकार किया था। ऐसे सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध मानवतावादी मार्ग चुना, जिसमें वर्ण व्यवस्था के आधार पर भेदभाव, अस्पृश्यता और अमानवीय व्यवहार किया जाता था। बाबा साहेब का धम्म परिवर्तन केवल धर्म परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज को समता, स्वतंत्रता, मैत्री और बंधुत्व पर आधारित जीवन प्रदान करने का ऐतिहासिक कदम था। कहा कि बौद्ध धम्म के पंचशील सिद्धांतों को अपनाकर समाज को अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़िवादिता से दूर रहना चाहिए तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। धम्म दीक्षा के 70 वर्ष बाद भी बौद्ध समाज की शैक्षणिक ,राजनीतिक, आर्थिक और औद्योगिक भागीदारी को लेकर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।
संगठन और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करना होगा: समाज के कुछ लोगों ने शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन आज भी बड़ी आबादी अभावग्रस्त जीवन जी रही है। कहा कि समाज के सर्वांगीण विकास में बाधाओं को पहचानना और उन्हें दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास करना जरूरी है। समाज को बांटने और आपसी मतभेद बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों के प्रति सजग रहते हुए शिक्षा, संगठन और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करना होगा। डॉ. बाबा साहेब ने सामाजिक विकास और मानव गरिमा को सर्वोपरि माना था। उनके विचारों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता पर विशेष ध्यान देना होगा।
