CG : श्रद्धा और संयम के समावेश से ही मनुष्य जीवन होगा सार्थक : मुनि संवेगरत्न सागर ...
विवेकानंद नगर में भगवान महावीर की अंतिम दिव्य देशना ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ का स्वाध्याय
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में सर्वमंगलमय वर्षावास में भगवान महावीर स्वामी की अंतिम दिव्य देशना पर आधारित श्रीमद् उत्तराध्ययन सूत्र का स्वाध्याय प्रारंभ है। मुनि संवेगरत्न सागर आदि ठाणा-5 की पावन निश्रा में प्रतिदिन धर्मसभा में श्रद्धालु जिनवाणी का श्रवण कर रहे हैं।
धर्मसभा में मुनिश्री ने उत्तराध्ययन सूत्र के 36 अध्ययनों में से प्रारंभिक तीन अध्ययनों का मूल पाठ एवं भावार्थ समझाया। प्रथम अध्ययन ‘विनयश्रुत’ में विनय को ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता बताया गया है। द्वितीय अध्ययन ‘परीषह प्रविभक्ति’ के माध्यम से कठिनाइयों को समभाव से सहन कर साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गई। वहीं तृतीय अध्ययन ‘चतुरंगीय’ में मनुष्य जन्म, जिनवाणी का श्रवण, धर्म के प्रति श्रद्धा और संयम के पुरुषार्थ को दुर्लभ बताते हुए इनके महत्व को समझाया गया।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन मिलना दुर्लभ है और इस जीवन में जिनवाणी सुनने का अवसर मिलना उससे भी अधिक दुर्लभ है। जब जीवन में श्रद्धा और संयम का समावेश होता है, तभी मनुष्य जीवन सार्थक बनता है। जो व्यक्ति साधना का महत्व समझ लेता है, वह छोटी-छोटी कठिनाइयों से विचलित नहीं होता और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता रहता है।
विपाक सूत्र में समझाया कर्मों का सिद्धांत
स्वाध्याय के दौरान विपाक सूत्र के माध्यम से कर्मों के सिद्धांत को भी समझाया जा रहा है। बताया गया कि मनुष्य आज जैसे कर्म करता है, भविष्य में उसे वैसे ही फल प्राप्त होते हैं। सुख-दुःख केवल संयोग नहीं, बल्कि अपने कर्मों के परिणाम भी हैं। मृगापुत्र के दृष्टांत के माध्यम से बताया गया कि सत्ता और अहंकार के मद में दूसरों को पहुंचाई गई पीड़ा के परिणामों से कोई बच नहीं सकता। कर्मों का फल समय आने पर अवश्य सामने आता है।
