राजनांदगांव | ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में बुधवार को खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य मुनि मौलिकप्रभ सागर ने कहा कि जब हम संसार रूपी सागर में डूब जाते हैं और ऐसे समय में सद्गुरु हमें तारने के लिए हाथ आगे बढ़ाए तो हम क्यों चूक जाते हैं। हमें यह मौका कभी नहीं खोना चाहिए।
सद्गुरु हमें तारने वाला होता है। जिस हृदय में गुरु का वास नहीं होता उस हृदय में प्रभु का वास भी नहीं हो सकता। कहा कि “पर’ के बारे में हमने बहुत सोच लिया है अब हमें अपने बारे में भी सोचना चाहिए। हम इस संसार में आखिर कब तक भटकते रहेंगे।
हमारे हृदय में यदि गुरु का वास होता तो हमारा जीवन अलग ही होता। हमारे भीतर पाप भरा हुआ है। हम कषायों से घिरे हुए हैं। मन में धन सम्पदा का वास है। मुनि ने कहा कि चिंतन करें कि हमारा जीवन किस प्रकार की राह में है और उसे किस प्रकार की राह में होना चाहिए। कहा कि कषायों से दूर रहें और जीवन को सफल बनाने का प्रयास करें।
