प्रदेश सरकार ने राज्य में भूमि का राजस्व सर्वेक्षण व बंदोबस्त करने की तैयारी शुरू कर दी है। बंदोबस्त की प्रक्रिया प्रत्येक 30 वर्ष में होती है। राज्य में इससे पहले (अविभाजित मध्य प्रदेश) 1997-98 में बंदोबस्त हुआ था। इस लिहाज से अब वर्ष 2028 में होगा। इस बार यह काम ड्रोन के जरिये किया जाएगा। मौजूदा समय की जरूरतों को देखते हुए सरकार ने इसके लिए भू-राजस्व संहित में व्यापक संशोधन किया है। मंगलवार को खत्म हुए विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सदन ने इन संशोधनों को मंजूरी दी है।
अधिकारियों ने बताया कि बंदोबस्त में मुख्य रूप से दो तरह के काम होते हैं। पहला भू- अभिलेख का नवीनीकरण और दूसरा भू-राजस्व का पुनर्निर्धारण। भू-अभिलेख का नवीनीकरण नहीं होने से जमीन के रिकार्ड में विसंगति बढ़ जाती है। इससे जमीन से जुड़े विवादों का निराकरण करना कठिन हो जाता है। बंदोबस्त की प्रक्रिया में भू-राजस्व का पुनर्निर्धारण महत्वपूर्ण होता है जो बिना भू-सर्वेक्षण के नहीं हो सकता।
बंदोबस्त नहीं अब भू-सर्वेक्षण
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता में किए गए संशोधन के अनुसार अब बंदोबस्त के स्थान पर भू-सर्वेक्षण और भू-राजस्व निर्धारण कहा जाएगा। इसके पीछे तर्क यह है कि इस बार बंदोबस्त के दौरान केवल जमीन का सीमांकन ही नहीं किया जाएगा बल्कि ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग कर पूरा नक्शा तैयार किया जाएगा।
जमीन के पट्टा वितरण में भी मिलेगी मदद
राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी भूमि में रहने वाले लोगों को भू-स्वामी का हक देने के लिए केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने केंद्रीय क्षेत्रीय स्वामित्व योजना 2020 शुरू की है। इस योजना को राज्य में लागू करने के लिए अधिनियम में संशोधन जरूरी था। इससे लोगों को पट्टा वितरण में आसानी होगी।
राज्य सरकार की योजनाओं को भी जोड़ा गया
राजस्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार मुख्यमंत्री वृक्षारोपण योजना के क्रियान्वयन और औद्योगिक नीति 2019-24 के तहत औद्योगिक क्षेत्रों और पार्कों के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए भी यह संशोधन जरूरी था। इसके माध्यम से दोनों योजनाओं में छूट का प्रविधान किया गया है।
पूरी प्रक्रिया होगी आनलाइन
अधिकारियों के अनुसार नक्शा, खसरा, नामांतरण सहित जमीन से जुड़ी अन्य प्रक्रियाओं को आनलाइन किया जा रहा है। ई-नामांतरण पोर्टल व ई-राजस्व न्यायालय के संचालन के लिए भी विधेयक में संशोधन जरूरी था।
चांदा-मुनारा को भी किया जाएगा आधुनिक
राजस्व अधिकारियों के अनुसार जमीन के सीमांकन के लिए हर गांव में एक स्थान निर्धारित होता है, इसे चांदा-मुनारा कहते हैं। आबादी के विस्तार के साथ ज्यादातर गांवों में चांदा-मुनारा गायब हो गए हैं। ऐसे में अब इसका निर्धारण अक्षांश और देशांतर के जरिये होगा। इससे डिजिटल नक्शा बनाना आसान होगा।
